धनतेरस पर पूजा कैसे करे और क्या है इसकी पूजा की विधि

शास्त्रों की अगर माने तो धनतेरस के दिन भगवान धन्वंतरी का जन्म हुआ था। यही कारण है कि इस दिन को धनतेरस के रूप में मनाया जाता है। धन्वंतरी का जब जन्म हुआ तब उनके हाथ में एक कलश भी था और तब से ही धनतेरस के दिन बर्तन खरीदने की परंपरा बानी। इस दिन से जुड़े कई कथाएं है जिनसे हम मालूम होता है कि धनतेरस की दिन की सुरवात कैसे हुई थी और इसका महत्व क्या है।
यदि इन कथाओं को पढ़ कर या जान कर ये भी मालूम किया जा सकता है कि धनतेरस के दिन धन को तेरह गुना बढ़ाने का दिन क्यों मन जाता है। धन्वंतरी भगवान का जन्म सागर मंथन से हुआ था और वे अपने साथ एक स्वर्ण कलश ले कर जन्मे थे और उसी स्वर्ण कलश में अमृत भर था जिससे सभी देवता पान करने के पश्चात अमर हुए।

धन्वंतरी के जन्म के दो दिन के बाद देवी लक्ष्मी प्रकट हुई जिसके कारण धनतेरस का पर्व दीवाली के दो दिन पहले मनाया जाता है। शास्त्रों मैं यह भी कहा गया है कि धन्वंतरी को देवताओं का वैद्ध मन गया है। यदि इनकी उपासना की जाए तो आरोग्य सुख अर्थात स्वास्थ्य लाभ मिलता है। मन तो यह भी जाता है की धन्वंतरी भगवान विष्णु का अंश है।

शास्त्रों के अनुसार भगवान विष्णु का ये अवतार संसार में चिकित्सा विज्ञान की स्थापना करने के लिए था। धनतेरस से जुड़ी एक और कथा भी है जिसमें ये बताया जाता है कि कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी के दिन देवताओं के कार्य में बाधा डालने के कारण भगवान विष्णु ने असुरों के गुरु शुक्राचार्य की एक आंख फोड़ दी थी। कथा में ये भी बताया गया है कि किस प्रकार भगवान विष्णु ने राजा बलि से देवताओं को भय से मुक्त करने के लिए वामन अवतार ले कर राजा बलि के हवन स्थल पर पहुंच गए, परन्तु असुरों के गुरु शुक्राचार्य ने राजा बलि को आगाह करते हुए कहा- “ यदि ये वामन आपसे कुछ भी मांगे इस मना कर दे ये स्वयं भगवान विष्णु है और तुमसे तुम्हारा सब कुछ छिनने आये है”। परन्तु राजा बलि ने शुक्राचार्य के बातों को नजरंदाज कर दिया और वामन द्वारा मांगे गए वर मैं तीन पग भूमि दान करने हेतु कमण्डल से जल निकाल कर संकल्प लेने लगे तभी शुक्राचार्य राजा बलि के कमण्डल में लघु रूप धारण कर प्रवेश कर गये जिसके कारण कमण्डल से जल निकलने का मार्ग बंद हो गया। वामन भगवान शुक्राचार्य की चाल को समझ गये। भगवान वामन ने अपने हाथ में रखे हुए कशा को कमण्डल में ऐसे रखा कि शुक्राचार्य की एक आंख फूट गयी। शुक्राचार्य छटपटाकर कमण्डल से निकल आये। बलि ने संकल्प लेकर तीन पग भूमि का दान वामन देव को कर दिया।


इसके बाद भगवान वामन ने अपने एक पैर से संपूर्ण पृथ्वी, दूसरे पग से अंतरिक्ष तथा तीसरा पग रखने के लिए कोई स्थान नहीं होने पर बलि ने अपना सिर वामन देव के चरणों में रख दिया। बलि दान में अपना सब कुछ गंवा बैठा। इस तरह बलि के भय से देवताओं को मुक्ति मिली और बलि ने जो धन-संपत्ति देवताओं से छीना था उससे कई गुणा धन-संपत्ति देवताओं को मिल गयी। इस उपलक्ष्य में भी धनतेरस का त्योहार मनाया जाता है।

धनतेरस की पूजा विधि:

1. छोटा सा स्वस्तिक एक लकड़ी के बेन्च पर बनाए ।
2. एक मिट्टी का दीपक उसी बेंच पर बने स्वस्तिक पर रख कर जलाएं।
3. दिए के आस पास तीन बारी गंगा जल का छिटकाव करें।
4. दिए पर रोली का तिलक लगायें। उसके बाद तिलक पर चावल रखें।
5. दिए में थोड़ी चीनी डालें।
6. इसके बाद 1 रुपये का सिक्का दिए में डालें।
7. दिए को प्रणाम करें।
8. परिवार के सदस्यों को तिलक लगायें।
9. अब दिए को अपने घर के गेट के पास रखें। उसे दाहिने तरफ रखें और यह सुनिश्चित करें की दिए की लौ दक्षिण दिशा की तरफ ही हो।
10. इसके बाद यम देव के लिए मिट्टी का दिया जलायें और फिर धन्वान्तारी पूजा घर में करें।
11. अपने पूजा घर में बैठ कर धन्वान्तारी मंत्र का 108 बार जाप करें। “ॐ धन धनवंतारये नमः
12. जब आप 108 बारी मंत्र का जाप कर चुके होंगे तब इन पंक्तियों का उच्चारण करें “हें धन्वंतरी देवता में इन पंक्तियों का उच्चारण अपने चरणों में अर्पण करता हूँ।
13. धन्वान्तारी पूजा के बाद भगवान गणेश और माता लक्ष्मी की पंचोपचार पूजा करना अनिवार्य है।
14. भगवान गणेश और माता लक्ष्मी के लिए मिट्टी के दिये जलाएं। धुप जलाकर उनकी पूजा करें।
15. भगवान गणेश और माता लक्ष्मी के चरणों में फूल चढायें और मिठाई का भोग लगायें।

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